खेतों का राजा (किसान) आज बाजार का गुलाम हो चुका है

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बहुत ही आश्चर्य होता जब अपना खून पसीना एक करके चाहे वह चिलचिलाती धूप हो,मूसलाधार होती हुई बारिश या हो हाड़ कँपाने वाली ठंड इन सबका परवाह किये बिना किसान आम जनमानस के लिये अपना जी जान लगा देता है अन्न उत्पादन में , पर आघात तब लगता है जब दिशाहीन हमारी कृषि नीति के परिणामस्वरूप अपने किसानों के ऊपर बिचौलिए का निर्मोही व दया विहीन मानसिकता का रौद्र रुप यह है कि औने पौने मूल्य से किसान के परिश्रम का भाव लगाया जाता है ,यह सब सरकारी तंत्रों की विफलता का दुष्परिणाम है ।समझ से परे यह है कि आखिर किसान के मेहनत की कमाई उसके बजाय सरकारी तंत्र द्वारा पोषित दलाल जो किसानों को फायदा देने के बजाय खुद मालामाल होते जा रहे है और किसान दिन प्रतिदिन गरीब से गरीब होते गये ,इतना घृणित कार्य करने के बाद भी किसी सरकार ने बिचौलियों पर लगाम लागाने का काम नही किया। आज किसान के सामने सब रास्ते बंद पड़े हुए है क्योंकि “एक तरफ़ कुआँ तो दूसरी तरफ़ खायी “है आलम यह है कि किसान खेती करना छोड़कर कोई और काम कर नही सकता क्योंकि खेत और गाँव में उसकी जान बसती है और सरकार संरक्षित दलाल किसान को जीने देना नही चाहते और न ही कोई ऐसा कानून बना रहे है जिससे कि किसान सीधे फायदा पाये । इन दारुण स्थिति को न सह पाने की हालत में कही किसानों का यह धैर्य जवाब देकर कोई राष्ट्रव्यापी किसान आंदोलन का रुप न ले ले जिसे सम्भाल पाना मुश्किल ही नही नामुमकिन भी हो जाये ।जब किसान खेती करना छोड़ देगा तो वो लोग सोचे किस ओर जिंदगी जायेगी ॥

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