कृषि और किसान की ऐसी दुर्दशा क्यों और कब तक बर्दाश्त किया जाय ||

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कभी देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहीँ जाने वाली कृषि आज अपनी बदहाली पर आँसू बहातीं नज़र आ रहीं है और अन्नदाता (किसान) सरकर की दोगली नीतियों के चलते अपनी लाचारी पर खुद को कोसता हुआ जिंदगी को बोझ बना बैठा है ,आखिर किसान की समस्याओं का समाधान क्यों नही किया जा रहा है जिससे कि किसान को खेत और कृषि से विमुख होकर गाँव को छोड़ने का विचार मन से त्यागने को मजबूर होना पड़े ! परंतु किसान को पंगु बनाकर रखने की सोची समझी रणनीति के तहत हर सरकार नीति बनाती चली आ रहीं है जिससे खेती की लागत तो बढ़ती जा रहीं है पर उत्पादन नही बढ़ रहा है यही कारण है कि किसान कर्जे के बोझ तले दबाता चला जा रहा है व राजनैतिक दल अपना हित साधने में आगे आते जा रहे हैं ॥ कितना दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि चुनाव के समय हर दलों के मुखपत्र में किसान आगे रहता है पर चुनाव बीतते ही दलों के चाल ,चरित्र और चेहरा में अंतर दिखने लगता है पर किसान स्वहित के चाहत में खुद इन बहुरूपियों के जाल में फंसता चला जाता है !उसके बाद की स्थिति से सब लोग अवगत ही हैं ॥मै यह जानना चाहता हूँ कि आखिर किसानों के लिये कोई स्थायी स्वतंत्र नीति क्यों नही लागू की जाती या किसानों के सम्मान को देखते हुऐ उपयुक्त कृषि नीति क्यो नही बनायी जाती जोकि पूर्व.की नीतियों की तरह असफल साबित न होते हुऐ किसान को समृद्ध और गाँव को खुशहाल बना सके !

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