किसानों को लोभ के मकड़जाल में फंसाने को बेताब होने लगी राजनीतिक पार्टिया

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कई प्रदेशों में विधान सभा का चुनाव आने वाले समय में होने जा रहा है ,चुनाव से पूर्व मृतप्राय अवस्था में जीवन जीने के लिये मजबूर हुए किसान और मजदूर किसानो की सुधि लेने वाला कोई नही दिखा परंतु चुनाव का समय नज़दीक आने पर हर ओर से सत्तालोभी संगठनो का किसान प्रेम चिंता का विषय बनता जा रहा है, कही यह दिखावा अपने देश की अर्थव्यवस्था को चौपट करने का कोई सोची समझी साजिश तो नही? मेरा मानना है कि किसान प्रेम अनुचित तो नही है पर लम्बे समयावधि के लिये न होकर राजनीतिक लाभ के लिये किसानों की मजबूरियों का स्थायी निदान न करते हुए उनकी कमजोर नसो को दबाकर भीख स्वरूप भेंट देने की बात करके उनके साथ घिनौना खेल कहीँ से भी उचित नही है ! किसान ही हमारे देश की वह मजबूत कड़ी है जिसको अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहा जाता रहा है ,आज भी है और हमेशा रहेगा भी ,परंतु राजनीतिक जिज्ञासा रखने वालों के लिये किसान और मजदूर किसान सिर्फ एक बेहतर वोट बैंक से कुछ नही मायने रखता, यह धारणा राजनीतिक हित साधने के लिये सही हो सकती है किन्तु देश के विकास में सबसे बड़ी बाधा का कारण भी है क्योंकि भारत गाँवों का देश है और गाँवों में किसान और मजदूर किसान रहते है जब तक गाँव को रोजगार सम्पन्न नही किया जायेगा तब तक न देश विकसित होगा न ही देश की राजनीत !इसलिये बेहतर यही है कि किसानों को माफी और लोभ देने के बजाय एक ऐसा प्रारूप दिखाया जाय जो एक स्थायी निदान के तौर पर जाना जाय ना कि सिर्फ चुनाव के समय याद आती रहे नही तो न ही किसान रहेंगे और न ही हमारे देश भारत का मान बचेगा न सम्मान और न ही नाम रहेगा ॥

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